बाबा साहेब जयंती पर विशेष

- बिहार चुनाव और दलित राजनीति
- आलेख: डॉ. शशिभूषण प्रसाद

बिहार में चुनावी साल है। लिहाजा सियासी पार्टियों में अपने अपने वोट बैंक को चाक-चौबंद करने की कवायद तेज़ होती दिख रही है। एक तरफ़ रैलियों का दौर शुरु हो चुका है तो वहीं जातीय समीकरणों को साधने की कोशिशें भी रफ्तार पकड़ने लगी हैं। बाबा साहेब अंबेडकर की जयंती के मौक़े को भुनाने और बिहार के दलित वोटरों को साधने की होड़ कमोबेश सभी दलों में देखी जा सकती है। ऐसे में सवाल मौजूं हो चला है कि आखरिकार बिहार में दलितों का सरताज कौन?
पहले बिहार में दलितों की ताक़त को समझ लेना जरुरी है। ये जान लेने की दरकार है कि क्यों इस बार चुनाव में हर दल की पसंद दलित वोटर बने हिए हैं। दरअसल सूबे में दलितों की आबादी करीब 19 फीसदी है। दलितों के लिए 38 विधानसभी सीटें आरक्षित हैं। लेकिन कई ऐसी सीटें और भी हैं जहां दलित किसी भी पार्टी को जिताने या हराना का माद्दा रखते हैं। जाहिर तौर पर बिहार के दलित मतदाता यहां सत्ता बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखे हुए हैं और इसी वजह से उन्हें लुभाने में हर राजनीतिक दल लगा हुआ है। ये इसी बड़े वोटबैंक की ताकत है कि नेता मेरे दलित औ मैं दलितों का रहनुमा ये बताने की कोशिश कर रहे हैं। और तो और सूबे की सत्ताधारी पार्टी जनतादल यूनाइटेड को भीम संवाद का आयोजन करना पड़ रहा है।

गौरतलब है कि प्रदेश के दलित वोटबैंक पर लंबे वक्त तक कांग्रेस की मजबूत पकड़ हुआ करती थी। लेकिन 90 के दशक में अगड़े बनाम पिछड़ों की जंग में दलित वोटर लालू की आरजेडी साथ खड़ा हो गया। अब कांग्रेस इसे वापस पाने के लिए हर तरह के कार्ड खेल रही है। इसी के तहत सूबे में पार्टी की कमान एक दलित नेता राजेश राम को सौंपी गई है। तो वहीं पहली बार चुनावी जंग में उतर रही जनसुराज भी दलितों को साधने में लगी है। चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर ने अपनी पार्टी का पहला कार्यवाहक अध्यक्ष एक दलित मनोज भारती को बनाया है। इस वादे के साथ कि जनसुराज सत्ता में आई तो दलितो की दुश्वारियां दूर हो जाएंगी। पार्टी ने इसके लिए पांच वायदे भी किए हैं। अव्वल तो ये कि जो भी दलित छात्र बच्चा दसवीं की परीक्षा 50 प्रतिशत अंक के साथ पास करेगा उसे दो हजार की मासिक छात्रवृत्ति दी जाएगी। दूसरे ये कि जिनके पास मकान नहीं उन्हें 3 डिसमिल आवासीय ज़मीन सरकार मुहैया कराएगी। तीसरा दलितों को खेती से जोड़ने को लेकर है। वो ये कि दलितों को खेती के लिए लीज पर सरकारी जमीन दी जाएगी। चौथा वादा स्वरोजगार के लिए सरकारी गारंटी पर पूंजी उपलब्ध कराने का है। पांचवां वादा दलितों को ज्यादा से ज्यादा नुमाइंदगी देने को लेकर है।
लेकिन चुनौतियां फिर भी कम नहीं। दलित वोटबैंक के एक बड़े हिस्से पर लोकजनशक्ति पार्टी का कब्जा रहा है। सूबे के 6 फीसदी पासवान वोटर दशकों से रामविलास पासवान के साथ रहे हैं और आज उनके बीच चिराग पासवान का क्रेज वैसा ही बना हुआ है। चिराग की एक झलक पाने को वो बेचैन नजर आते हैं। खुद चिराग पासवान इसे अपने पिता की कमाई और उन्ही की विरासत मानते हैं। सच तो ये है कि एनडीए में चिराग पासवान की अहमियत और उनकी हैसियत इसी वोटबैंक के दम पर है। लोजपा की कोशिश पासवान वोटरों के अलावा दूसरी दलित जातियों को भी लोजपा से जोड़ने की है। क्योकि रामविलास पासवान के बाद चिराग पासवान बिहार में दलितों के सर्वमान्य नेता के तौर पर उभर चुके हैं। जबतक रामविलास पासवान रहे, यहां लाख कोशिश के बावजूद मायावती की बहुजन समाज पार्टी की दाल नहीं गली और अब चिराग पासवान के सामने चंद्रशेखर आजाद जैसे दलित नेताओं की कोई चाल काम नहीं आ रही।
आपको याद होगा पिछले चुनाव में चिराग पासवान के कारण नीतीश कुमार से दलित वोटर छिटक गया था, जिसके चलते उनकी सीटों की संख्या घटकर 43 हो गई थीं. वहीं लोकसभा चुनाव में दलितों ने बीजेपी का बायकॉट कर दिया था। संविधान और आरक्षण के मुद्दे पर बीजेपी के खिलाफ तैयार किए गए नैरेटिव से दलित वोटर बीजेपी से दूर हो गया था और पार्टी को इसका बड़ा नुकसान भी उठाना पड़ा। बीजेपी अब विपक्ष के उस चक्रव्यूह को तोड़ने की कोशिश में है, जो 2024 के लोकसभा चुनाव में उसके खिलाफ तैयार किया गया था और इसके लिए बीजेपी और जेडीयू ने लोकजनशक्ति पार्टी के साथ मिलकर जिस ‘ऑपरेशन-D’ पर काम शुरू कर दिया है बताते हैं कि उसका सबसे भरोसेमंद चेहरा चिराग पासवान ही हैं।
लेखक परिचय- बिहार के एक जाने-माने उद्धमी, साहित्य और संस्कृति में अभिरुचि, समाज कल्याण की भावना डीएनमें, बिहार की राजनीति की गहरी समझ
संप्रति- लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास से जुड़ाव
