#मधेपुरा एलपीजी किल्लत का कहर: छोटे दुकानदार-मजदूर धुएं में सांसें लें, ब्लैक गैस ने तोड़ी कमर!

एलपीजी के संकट से दुकानदारों पर पड़ रहा है असरशहर सहित पूरे क्षेत्र में एलपीजी संकट अब सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दिहाड़ी मजदूरों, छोटे व्यापारियों और रेहड़ी-पटरी वालों की जिंदगी पर गहरा असर डाल रहा है. गैस की किल्लत, लंबी कतारें और बंद पड़ी दुकानें जहां लोगों को भटकने पर मजबूर कर रही हैं, वहीं बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव के चलते कोयला और लकड़ी भी इन दिनों महंगे हो गए हैं. ऐसे में लोग मजबूरी में धुएं वाले चूल्हों की ओर लौट रहे हैं और बढ़ती लागत ने उनकी रोजी-रोटी पर सीधा वार किया है.एलपीजी संकट गहराया, धुएं में घुटती रोजी-रोटीब्लैक में महंगी हुई गैस से संचालकों की कमाई घटी, लागत बढ़ी

शहर में गहराते गैस संकट ने अब छोटे ढाबों और रेहड़ी-पटरी पर खाना बेचने वालों की रोजी-रोटी पर सीधा असर डाला है. पहले जहां एलपीजी सिलेंडर की नीली लौ पर दाल-रोटी पकती थी, वहां लकड़ी और कोयले के चूल्हे जल रहे हैं.अब धुएं के बीच खाना बनाना मजबूरी बन गया है, और बढ़ती लागत ने छोटे कारोबारियों की कमर तोड़ दी है.वही स्थानीय लोगों का कहना है कि गैस संकट का ज्यादा असर गरीब और छोटे कारोबारियों पर पड़ रहा है.बड़े होटल और रेस्टोरेंट किसीशहर के पुराने बस स्टैंड सड़क किनारे ढाबा चलाने वाले छोले बटोरे वाले ने बताया कि पिछले कई दिनों से गैस सिलेंडर समय पर नहीं मिल रहा है. एजेंसी जाने पर स्टॉक खत्म होने की बात कही जाती है.

मजबूरी में एक दो दिन दुकान बंद करना पड़ता है. लोगो का कहना है कि बाजार में गैस ब्लैक में मिल रही है जिसकी कीमत 2000 से 3000 से ज्यादा है. जो छोटे दुकानदारों के लिए बहुत महंगा है. सिलेंडर खरीदने पर खाने का रेट बढ़ाना पड़ेगा, जो हर कोई ग्राहक नहीं दे पाएगा.सिलिंडर के लिए एजेंसी के बाहर खड़े लोग गौरतलब हो कि बड़े बड़े दुकानदार किसी तरह सिलेंडर का इंतजाम कर लेते हैं लेकिन छोटे ढाबे वालों के पास सीमित संसाधन हैं. ऐसे में प्रशासन कहते है कि जिला में किसी तरह की सिलेंडर की कमी नहीं है.लेकिन धरातल स्तिथि कुछ और बयां करती है.शहर के कॉलेज चौक बिरयानी दुकानदार संचालक मो असलम का कहना है कि गैस कमी का असर ग्राहकों की संख्या पर भी पड़ा है.

लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनने में समय ज्यादा लगता है, ग्राहक इंतजार नहीं कर पाते और दूसरे जगहों पर चले जाते हैं,अब आधी कमाई भी मुश्किल हो गई है.छोटे दुकानदार वाले चुन्नू साह बताते हैं कि गैस संकट ने छोटे दुकानदार को पुराने दौर में धकेल दिया है. लकड़ी के चूल्हे पर काम करना मुश्किल है, साथ ही धुएं और गर्मी के कारण स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है.झुग्गी बस्ती में रहने वाले ज्यादा परेशानशहर सहित आसपास इलाकों में एलपीजी की आपूर्ति में कमी ने दिहाड़ी मजदूरों की रोजमर्रा की जिंदगी को मुश्किल बना दिया है.गैस एजेंसियों पर बड़े सिलिंडरों के लिए लंबी कतारें लगी हैं, वहीं छोटे सिलिंडर भी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं. ऐसे में छोटे सिलिंडरों पर निर्भर मजदूरों को गैस के लिए इधर-उधर भटकना पड़ रहा है. कई इलाकों में गैस भरने वाली दुकानें बंद पड़ी हैं और जहां पहले भीड़ रहती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा हुआ है.वही अधिकांश लोग रोज कमाने और खाने वाले हैं.कोई मजदूरी करता है, कोई रिक्शा चलाता है, तो कोई घरेलू काम करता है. सीमित आमदनी और अनिश्चित खर्च के बीच वड़े गैस सिलिंडर खरीदना इनके लिए संभव नहीं है. छोटे सिलिंडर ही इनके लिए सस्ता और सुविधाजनक विकल्प थे, जिन्हें ये अपनी जरूरत के अनुसार भरवाकर उपयोग करते थे.लेकिन पिछले कुछ दिनों से गैस आपूर्ति प्रभावित होने के कारण यह व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है.छोटे सिलिंडर की किल्लत से परेशानीबड़े सिलिंडरों के साथ साथ छोटे सिलिंडरों की कमी भी लोगों के लिए गंभीर समस्या बन गई है. कम खपत वाले परिवारों और छोटे कारोबारियों को खासतौर पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है.कई एजेंसियों पर छोटे सिलिंडर या तो उपलब्ध नहीं हैं या बेहद सीमित संख्या में मिल रहे हैं, जो जल्दी खत्म हो जाते हैं.ठेला चालकों, छोटे दुकानदारों और किराए पर रहने वाले लोगों के लिए यह स्थिति और भी गंभीर है, क्योंकि वह बड़े सिलिंडर का खर्च नहीं उठा सकते.वही मजबूरी में उन्हें महंगे विकल्प अपनाने पड़ रहे हैं.शहर के सदर अस्पताल चौक स्थित मो मुन्ना बताते है कि पहले गैस भरवाकर काम चला लेती थीं, लेकिन अब कई दिनों से गैस नहीं मिल रही है. घर में छोटे बच्चे हैं और पति की सीमित आय के कारण खाना बनाना चुनौती वन गया है. वहीं, बाहर से काम करने आए मजदूर मनोज का कहना है कि गैस की कमी के कारण उन्हें होटलों या ढाबों पर जाकर महंगा खाना खाना पड़ रहा है.
