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फोटो-मधेपुरा- 04- दुर्गा मंदिर परिसर में हो रहा कार्य

  • 122 वर्ष पुराना है मंदिर, श्रद्धालुओं की आस्था का है केंद्र –
    -बांग्ला दुर्गा मंदिर, बंगाल एवं बिहार की सांस्कृतिक परंपराओं को करता है मजबूत


जिला मुख्यालय के मुख्य बाजार स्थित बांग्ला दुर्गा मंदिर का इतिहास दशकों पुराना है. इस जगह पर मां दुर्गा की पूजा अर्चना वर्ष 1901 की जाती है. उस समय यह मंदिर बांस एवं खरपतवार से निर्मित फुस के घर में था. इस झोपड़ीनुमा कच्चे मकान में बने मंदिर में मां दुर्गा की पूजा की जाती थी. धीरे-धीरे समय बदलता गया एवं मंदिर को भव्य रूप देने के लिए चर्चा होने लगी. इसके बाद लोगों के अथक प्रयास के बाद यहां खपड़े का मंदिर बनाया गया. बंगाली समाज द्वारा इसमें वर्षों तक पूजा अर्चना की जाती रही. वर्ष 2012 घोष परिवार एवं स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर को भव्य रूप दिया. कुछ कारणवश कई वर्षों तक इस मंदिर में मजबूत कमेटी नहीं बन पायी थी.
श्यामापदो घोष, सतीश चंद्र घोष के बाद चौथी पीढ़ी के परिजनों ने स्थानीय लोगों को बुलाया एवं एक मजबूत कमेटी बनायी. इसमें संरक्षक उद्दालक घोष, अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद, सचिव इंद्रनील घोष, सचिव त्रिदीप गांगुली उर्फ बुबुन दा, संयोजक प्रमोद अग्रवाल एवं कोषाध्यक्ष राय महेश्वर कुमार, शामिल रहे. यह कमेटी इतनी मजबूत बनी कि आज भी इसी कमेटी के द्वारा दुर्गा पूजा संचालित की जाती है. इस मंदिर में पूजा अर्चना स्थापना काल से ही बंग्ला समाज के लोग ही करते आ रहे है, लेकिन आज स्थानीय बिहारियों के द्वारा भी सम्मिलित रूप से किया जाता है.

  • संधि पूजा में खिचड़ी का लगता है भोग –
    मंदिर कमेटी के सचिव इंद्रनील घोष ने बताया कि दशकों पूर्व से इस मंदिर में विधि-विधान से मां भगवती की पूजा अर्चना होती आ रही है. दिन-ब-दिन लोगों की आस्था इस मंदिर से बढ़ती गयी. स्थानीय लोगों में मंदिर के प्रति यह अटूट आस्था व श्रद्धा है कि माता के दरबार से कोई खाली नहीं जाता हैं. ऐसी मान्यता और विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गयी मुराद मां जरूर पूरी करती है. साथ ही इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां अष्टमी की पूजा को संधि पूजा कहा जाता है एवं यह पूजा मुख्य पूजा भी माना जाता है. इस पूजा के दिन मां दुर्गा को खिचड़ी का प्रसाद का भोग लगाया जाता है. दूरदराज से यहां लोग इस प्रसाद का सेवन करने तथा अपनी याचना और फरियाद ले कर पहुंचते है.
  • षष्ठी पूजा के दिन होती है कलश स्थापना –
    मंदिर कमेटी के कोषाध्यक्ष राय महेश्वर कुमार महेश ने बताया कि बांग्ला दुर्गा मंदिर में बांग्ला रीति रिवाज के अनुसार षष्ठी पूजा के दिन कलश स्थापना की जाती है. इस मंदिर में बांग्ला परंपरा के अनुसार नवरात्रि में पूजा होती है. बंगाल के वर्धमान एवं कोलकाता के पुरोहितों द्वारा पूजा अर्चना करवायी जाती है. यहां के प्रतिमा की विशेषता है कि प्रत्येक पूजा के दिन मां के रूप में परिवर्तन हो जाता है. मूर्तिकार के दिये रूप से उस दिन मां की प्रतिमा अलग दिखती है. कलश स्थापना से लेकर महानवमी तक नियमित रूप से आरती में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ पंडाल में लगी रहती हैं. मंदिर परिसर में हजारों लोगों की भीड़ जुटती है. इसके सुरक्षा के लिए पुलिस प्रशासन के अलावे कमेटी के सदस्य सक्रियता से लगे रहते हैं. पंडित कल्याण बनर्जी और निखिल भट्टाचार्य भी बंगाल से ही पूजा करने आते हैं. मूर्तिकार कार्तिक दास और उनकी पत्नी सेमाली दास द्वारा वर्षों से मूर्ति बनाया जाता है. विधि विधान से पूजा कराने के लिए पंडित कोलकाता से मंगाये जाते हैं. पूजा समिति के सचिव इंद्रनील घोष ने बताया कि पिछले साल करीब पांच लाख रुपये खर्च हुये थे. इस बार कुछ अधिक होने की उम्मीद है. उन्होंने बताया कि पंडाल निर्माण के लिए कमेटी की बैठक में निर्णय लिया जायेगा. यहां की लाइटिंग व्यवस्था काफी आकर्षक होती है. पंडाल निर्माण के लिए कारीगर बंगाल से मंगाये जाते हैं. मंदिर परिसर में हजारों लोगों की भीड़ जुटती है. पंडित कल्याण बनर्जी और निखिल भट्टाचार्य भी बंगाल से ही पूजा करने आते हैं.

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